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Tuesday, November 13, 2012

चाँद अब सुर्खियों में रहता है


अपनी ही मस्तियों में रहता है
चाँद अब सुर्खियों में रहता है

है अँधेरा भी उस के पास कहीं
सिमट कर हाशियों में रहता है

सब सितारे भी मेरे डूब चुके
दुख मेरी राशियों में रहता है

भर्म का आयना था टूट गया
दिल मेरा किरचियों में रहता है

दिल में इनसान के,का'बे में नहीं
न खुदा काशियों में रहता है

Tuesday, September 4, 2012

दुआ-ए-मुल्तमस

दुआ-ए-मुल्तमस
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चलो यूं करते हैं
कि रात की तन्हाइयों को
लबों की ख़ामोशियों में
बांध लेते हैं ,
और बङा लेते हैं कुछ
तारीकीयों को
तेरी ज़ुल्फ़-ए-सियाह को तान कर,
और
सितारों से गुज़ारिश करते हैं कि
भींच लें अपनी आखें
कुछ देर के लिए-
चलो
चांद को बुझा लेते हैं----------


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Tuesday, June 12, 2012

जान जाएगी, जान जाओगे




कब यह सोचा था यूँ सतायोगे
अलविदा ! और भूल जाओगे


हर सू रंगीं बहार राइज़ है
आ गये फूल तुम कब आयोगे


कैसे जीते हैं लोग मर कर भी
जान जाएगी, जान जाओगे


तुम भी, सोचा न था कभी होगा
यूँ मेरा ज़ब्त आज़माओगे 


शाम-ए-जीस्त अब , कि तुम तो कहते थे 
शाम ढलते ही लौट आओगे 


कैसे जीता हूँ देखने के लिए
मर भी जाऊंगा क्या तुम आओगे ?!!


जानते, तुम तलक को हार चुका
इस से आगे भी कुछ हराओगे 


यही एजाज़ -ए-राह-ए - फुरकत बस
रो ही दूंगा न गर रुलाओगे 


दिन नहीं दूर कि शिकवा होगा
मेरा पूछोगे और न पाओगे 


अब कि हारा तो तेरी जीत नहीं 
मैं न कहता था हार जाओगे 


चले जाओ कि अब कि जाते हो 
याद आओगे, बहुत आओगे !!!

Saturday, February 11, 2012

रात कटी गिन तारा तारा


रात कटी गिन तारा तारा
बर्हम दिल का आलम सारा


तेज़ लिये दन्दान-ए-इश्तहा
मूँह खोले बैठा अँधिआरा


दर्द इश्क़ का मीठा मीठा
पर यादों का पानी ख़ारा


साकित अहद-ओ-तहय्या-ए-ज़ीस्त
तेज़ बहाव वक़्त का धारा


अक़्स तेरा साबित है बस इक
आइना-ए-दिल पारा पारा


शोर-ए-बग़ावत आह-ओ-फ़ुगानी
अश्क़ हरासाँ आँख का नारा


तूफ़ानों के मन्ज़र-नामे
खसता-कश्ती दूर किनारा


ज़ख़्मों का दर्मां हो जाए
तलब रही और ना ही चारा


दुनिया फ़ुज़ला-ओ-फ़राबानी
तू जो नहीं कुछ नहीं हमारा


पहलू बैठ ख़ून-ओ-ख़ूँ रोए
और करे का दिल बेचारा

Friday, February 3, 2012

जो भला करता है कब उसका बुरा होता है


" मुद्दई लाख बुरा चाहे तो क्या होता है "*
जो भला करता है कब उसका बुरा होता है


हैफ दिल पर कि उसी को ही पढे जाए है
जो न हाथों की लकीरों में लिखा होता है


मायल-ए-ख़ुदकुशी दहकान हो तो क्यों न मगर
और भी फ़स्ल उठे क़र्ज़ बढा होता है


उस के आने पे ठहर जाता है दो पल के लिए
जाए तो दर्द मगर और सिवा होता है


देर देखा है कि मजनूँ को खढे नब्ज़-ब-कफ़
इश्क सुनते थे कि इक रोग लगा होता है


गो रिआज़ी में सही मनफी से मनफी को जमा
जो बुरा चाहे बुरा कब कि भला होता है


इक नुमाइश है यूँ आसार-ए-क़दीमा मानिन्द
दिल तो जब है कि कोई इस में वसा होता है


* tarahi misra

Tuesday, January 31, 2012


फिर न दिल की बात अपनी कह सका
इक नज़र के फासिले पर ही तो था


ज़ह्न को राहत ना दिल को दे सुकून
क्या फिर ऐसी आशिकी से फायदा


दुनिया भर के दुख तुम्हें महसूस हों
यूँ बङा ले अपने दिल का दायिरा


ज़िंदगी इक कारज़ार-ए-मुस्तकिल
यह नहीं खा पी लिया और सो लिया


इश्क में गर हारना ही जीत है
जीतने दे यार को तू हार जा


चार-सू अब ज़ुल्मतों का शोर है
कौन था जो रात होते बुझ गया


रंग-ओ-बू सब , कैसे तुझ को भूल जाऊं,
तेरी हस्ती के निशाँ यह जा-ब-जा


अलविदा का वार तो हम सह गए
ज़ख्म को रिसना मगर था देर-पा


धीरे  से वह कह गया हो अश्कबार
अब तलक दिल झेलता है ज़लज़ला


जी लिया मर मर के यूँ तेरे बगैर
मर ही जाता था न इतना हौसला


लाशों के ढेरों पे लश्कर ग़ामज़न
है यही तव्ारीख मूजब इर्तिक़ा


तेशे से सर फोङना लाज़िम उसे
मह्रबाँ जिस पे जुनूँ का देवता


ख़ार-ज़ार-ए-चश्म में ग़र्क़ाब हो
एक नाज़ुक खव्ाब था सो गल गया

Sunday, January 29, 2012


चश्म-ए-मैगूना जाम किया
फिर इश्क किया इक काम किया


फिर हुस्न की धूप में दिल सेका
सिआह ज़ुल्फ तले आराम किया


इक ग़ज़ल बहम इक तलब-ए-क़लम
जो भी था उसी के नाम किया


तेरे नाम से जो भी ताना तुर्श
था अपने लिये दुशनाम किया


हुस्न-ए-जानां धुन में निकले
है सजदा हर हर गाम किया


कब मैं ने तुझे न याद किया
हर सहर किया हर शाम किया


कोई ख़ार-ए-जिगर, इक मस्त नज़र
जो तुम ने दिया परवान किया


गुलशन रन्ग-गाह हर बाद-ए-सबा
माह-ओ-मिहर तेरे हमनाम किया


चश्म-ए-साक़ी यह शेवा-ए-नज़र
है वज़द किया रिंदान किया


यादों के मुअत्तर फूलों से
है दामन-ए-दिल गुन्जान किया

Friday, January 20, 2012

इक तुम ही तो

मेरे जोश-ए-जनूँ
 की महकी दुआ
मेरे दिल की सदा
इक तुम ही तो हो;
मेरा दर्द-ए-निहाँ
की कार-ए-निवाज़
और उस की दवा
इक तुम ही तो हो;



फूल पँखङियों पे

 रन्ग सजा
मेरे खाबों के
 बागों में खिला
खुशबू से भरा
इक तुम ही तो हो;
चाहत का सिला
खिल फूल हुआ
ओर महकता-
इक तुम ही तो हो;



सावन रुत की

 रिमझिमती फुहार
भँबरे की सदा, 
कोयल की पुकार
घनघोर घटा-
इक तुम ही तो हो;
वल खाती हवा
सम बाद-ए-सबा
सावन की घटा-
इक तुम ही तो हो;



चेतर-सुबह को

 सरसों में खिली
खेतों में  जैसे
 धूप उगी
कलियों की अदा
इक तुम ही तो हो;
भँवरे का फिदा
मदमसत नवा
गुल-परकरमा
इक तुम ही तो हो;

सब तुम ही तो हो

Tuesday, January 17, 2012

जान जाएगी, जान जाओगे


कब यह सोचा था यूँ सतायोगे
 अलविदा ! और भूल जाओगे

हर सू रंगीं बहार रायज है
आ गये फूल तुम कब आयोगे

कैसे जीते हैं लोग मर  कर भी
जान जाएगी, जान जाओगे

तुम भी, सोचा न था कभी होगा
यूँ  मेरा ज़ब्त आज़माओगे 

शाम-ए-जीस्त अब , कि तुम तो कहते थे 
शाम ढलते ही लौट आओगे 

कैसे जीता हूँ देखने के लिए
मर भी जाऊंगा क्या तुम आओगे ?!!

जानते, तुम तलक को हार चुका
इस से आगे भी कुछ हराओगे 

यही एजाज़ -ए-राह-ए - फुरकत बस
रो ही दूंगा न गर रुलाओगे 

दिन नहीं दूर कि शिकवा होगा
मेरा पूछोगे और न पाओगे 

अब कि हारा तो तेरी जीत नहीं 
मैं न कहता था हार जाओगे 

चले जाओ कि अब कि जाते हो 
याद आओगे, बहुत  आओगे !!!

Sunday, January 15, 2012

यह होश मुझे अब होश नहीं


नहीं साहिब मैं मदहोश नहीं
यह होश मुझे अब होश नहीं

कुछ गोआई भी ,  जुबां जो है !!
गूंगी तो हो ,खामोश नहीं

कुछ तारों और लकीरों का 
तेरा ना मेरा दोष नहीं

सभ कहते हैं रब है , होगा !
लेकिन बा-चश्म -   -गोश नहीं

टूटा है पः , इशक पे आमादा 
दिल को अब भी संतोष नहीं 

बस शोला- बिआनी , आग-ज़नी
इक जब्र तो है पर जोश नहीं 

चश्म --मैगूना साकी मगर 
मद हूँ पर बादा-नोश नहीं 

दस्तार- -ब़र-सर - -वक़्त  हो तू
जाते पल का पा-पोश नहीं


Saturday, January 14, 2012

बहुत मुश्किल है यादों का भुला देना

कभी रोना कभी रोते हँसा देना
बहुत मुश्किल है यादों का भुला देना 

सुलगती याद पे दार-ए-नमु होना 
तिरा आँचल कि शोलों को हवा देना 

वर्क पे अश्क का रुशनाई हो जाना 
ज़िक्र याराँ है कलमों को सज़ा देना 

हुई मुद्दत है खोया दिल हसीं  मालिक 

मिरा है देख लेने दे, ज़रा देना 

सर-ए-महफ़िल बहारों का समाँ होना 
तिरा ऩज़रें झुका के मुस्कुरा देना 

गई रातों फुगाँ से थपथपा देना 

खुली आँखों में यादों को सुला देना 

तिरा सदका फ़क़ीरों को बखश देना 
मुरादें पूरी हों !! उनका दुआ देना 

उम्मीदों के चिरागों को जला रखना 

कि रस्म-ए-इश्क़ है  खुद को मिटा देना 

बहा यह  खूँ किसी तो काम आ जाए 
किसी नाज़ुक हथेली को हिना देना 

मिलेंगे, कह गये हंगाम-ए- महशर पे  

कयामत बरपा हो तादम दुआ देना

खाब-ए-रंगीन





रात
नींद में बैठ कर मेरी
सपना एक बुनती रही
चाँदनी क़ी धागों पर
खुश्बू के फूल टांक
हवाओं क़ी रागिनी के सुर
गुनगुनाती धारीयों में बाँधती

और फिर ये रंगीन चादर
उजले ख्वाब क़ी
सब्ज़ वादीओं में फहराती
रोशनी क़ी राहों में फैल गई
कोई तो चलेगा इस पर भी
ताबीर का दिया लेकर